मंगलवार, 23 जून 2026

ज़रा ज़रा सी बातों पर भी

ज़रा ज़रा सी बातों पर भी, अंतर्मन क्यों रो देता है ||2||

किसी पेड़ से डाली टूटे, या फिर फूल कहीं मुरझाए
नदियां प्यास लिए भटके, या सागर उफन उफन इतराए
जब जमीन पर गिरे घोसला, तृण-तृण बिखर बिखर चिल्लाए
या जब जेठ छले वसंत को, हरी दूब का तन झुलसाए
पतझर की वीरानी को जब-जब, अपनी सी लगती है
झरे हुए पत्तों के जैसे, दुनियादारी खो देता है
ज़रा ज़रा सी बातों पर भी, अंतर्मन क्यों रो देता है

टेसू के मौसम लगने पर, जंगल जब रंगत खोते हैं
और वृक्ष के संग पपीहे, जब-जब बारिश को रोते हैं
अमलतास के अंतिम स्वर्णिम झुमके, जब मिट्टी होते हैं
मरते-मरते भी पलाश के फल, भविष्य अपना बोते हैं
क्यों फिर किसी करुण विलाप का, रोम-रोम को तड़पा जाना
सच में अगणित बीज गीत के, मेरे भीतर बो देता है
ज़रा ज़रा सी बातों पर भी, अंतर्मन क्यों रो देता है

बर्फ पिघलती हो पर्वत की, या पर्वत से टूटे पत्थर
या पर्वत से टकराकर खुद, वापस आए मेरे ही स्वर
क्या, क्यों, कैसे किसी प्रश्न का, मिले नहीं जब कोई उत्तर
लगता चिड़िया का एक बच्चा, लौट न पाया पुनः नीड़ पर
ऐसे में फिर विरह-व्यथा, या गीत वियोगी का सुनना भी
चुपके से मेरे नैनों की, काली कोर भिगो देता है
ज़रा ज़रा सी बातों पर भी, अंतर्मन क्यों रो देता है
अंतर्मन क्यों रो देता है

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