शुक्रवार, 30 मार्च 2012

दैर तलक सोई मैं



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उससे के बाद गगन घनघटा से युक्त हुआ
उससे के बाद पवन फिर से उद्दण्ड हुआ
उसके के बाद क्या तन कर, खुल कर बरसी
साँसों-साँसों सा मन धरती का तृप्त हुआ

दूर हुए नभ पर लहराते कुपितित साप
भूली सुखानों ने फिर से पर फैलाए
बरसों से तन बस भटके विषण्ण पाखी से
बीते दिन लौट आज बाग़ पर तक आए

चूक गया कानों में, चिरपरिचित अपनापन
झूल गया बाहों में इठलाता अभिमान
पिघला परिभाषा बन, स्मृति की उँगली से
दूर हुई पल भर में बरसों की जमी ऐंठन

दोहराते प्रियतम ने परिणय की परिभाषा
जाग उठी तन-मन में सुप्त हुई अभिलाषा
परदों से चुगी लिये झोंके वे हठ निकले
मोतों ने लूट लिया बरसों का सन्नाटा

प्रियतम के हाथों को हाथों में लिपटा कर
उल्लसित हृदय लिये वे भर कर रहीं मैं
मस्त मगन मन के नवनीतित पुल सपनों के
रंगों से घुल मिल कर देर तलक सोई मैं

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