मैं पीला-पीला सा प्रकाश, तू प्रकाशक दिन-सा उजास।
मैं आम, पीलिया का मरीज़, तू गोरे चिट्टे भेष ख़ास।
मैं खड़-खटवार अवांछित-सा, तू पूजा की है हद सखी!
मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी!
तेरी-मेरी ना समता कुछ, तेरे आगे ना जमता कुछ।
मैं तो साधारण-सा लट्टू, मुझमें ज्यादा ना क्षमता कुछ।
तेरी तो दीवानी दुनिया, मुझसे बहु जाते ऊब सखी।
मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी!
कम वोल्टेज में तू न जले, तब ही मेरी कुछ बात गले।
बरदा मेरी है पृथक ठौर, जहाँ तुझे हो मान मिले।
दूर भले मैं भी हूँ ठेला, तेरा हाइप बना खूब सखी!
मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी!
बिजली का तेरा खर्च कम, लेकिन लाइट में कितना दम।
सोचिये, इन्फ्लेशन बिना लड़े ही, जीता जाए तू खुद कम।
नूर मेरी झकमार पड़ी, लगता जायेगी डूब सखी!
मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी!
तू महँगी है मैं सस्ता हूँ, तू चाँदी तो मैं जस्ता हूँ।
इठलाती है तू अपने पर, लेकिन मैं खुद पर हँसता हूँ।
मैं कभी नहीं बन पाऊँगा, तेरे दिल का महबूब सखी!
मैं बल्ब और तू ट्यूब सखी!

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - हंसी के फव्वारे पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |
जवाब देंहटाएंहास्यरस की स्तरीय कविताएं कम ही मिलती हैं । यह कविता अच्छी है ।
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